Central India Outreach Blog

Archive for December, 2011

“उसका नाम अद्‌भुत युक्ति करनेवाला” (यशायह 9:6)

जब यीशु 12 वर्ष के थे तो उनके माता पिता ने उनहे यरूशलेम लेकर गये जहां उनहोने शास्‍त्रियों और विद्वानों को अपने बुद्धि से अचंबित कर दिया। जब वे सार्वजनिक सेवकाई में उतरे तो लोग उनके शिक्षाओं से चकित हो जाते थे। वे कहते थे कि वे शास्‍त्रियों के समान नही परन्‍तु अधिकार के साथ सिखाते थे। उनके सामने अहंकारी मुंह बंद हो जाता था और चालाक जीभ स्‍वयं फंस जाता था। फिर भी उनके मुंह से सर्वदा ज्‍योति और सुगन्‍ध ही प्रवाहित होता था। शिष्‍य ने कहा तुझे छोड हम कहा जा सकते है क्‍योंकि तेरे पास अनंत जीवन की बाते है। (यूहुन्‍ना 6:68) वह अद्‌भुत युक्ति करनेवाला था।

शिक्षा में वे अद्‌भुत थे

बिना पिता से सुने वे कुछ नही कहते थे। वे सत्‍य की गवाही हेतु ही आये। वे कह पाते थे कि मूसा ने तो ऐसा-ऐसा कहा परन्‍तु मै तुम से यूं कहता हुं। वे शिक्षा देने में अदभुत अधिकार रखते थे। वे सत्‍य थे।

समझ में वे अद्‌भुत थे

वे बच्‍चों को, जवानों को, धार्मिक अगुवों को, राजनेताओं को सभों को पहचानते थे। वे उस धनवान जवान को पहचानते थे और उस गरीब विध्‍वा को भी। वे सभी मनुष्‍यों को जानते थे और समझते थे कि उनमें क्‍या है (यूहुन्‍ना 2:24,25)। वे समझ में अद्‌भुत थे।

डांट-फटकार में वे अद्‌भुत थे

उनहोने धार्मिक अगुवों को उनके पखण्‍डपन के लिए डांटा। वे गलत और सही को साफ-साफ दर्शाते थे और सत्‍य को असत्‍य से अलग करते थे। वे कभी सिद्धांत मे समझौता नही करते थे। वे अद्‌भुत युक्ति करनेवाले थे क्‍यों की वे सुधार की छडी का सही उपयोग जानते थे।

मार्गदर्शन में वे अद्‌भुत थे

उनहोने शिष्‍यों को बुलाया और उनके प्रशिक्षण में उनकी अगुवाई की। उनहोने लोगों को सत्‍य मार्ग का दर्शन दिया। वे मार्ग है। वे जगत की ज्‍योती है।

“His name will be called Wonderful Counselor” (Isaiah 9:6)

When Jesus was 12 years, His earthly parents took Him to Jerusalem where He astounded the scribes and the experts in Law with His wisdom. When He got into His public ministry, the crowds were astonished by His teaching. They remarked that He didn’t teach like the scribes but spoke with authority. Before Him the proud mouth fell silent and tricky tongue found no room of escape. Yet, from those lips flowed such fragrance and light that the disciple remarked “Lord to whom shall we go? You have the words of eternal life” (John 6:68). He was the Wonderful Counselor.

1. He was Wonderful in His Doctrine

He said that He never spoke unless He had heard from the Father. He came to bear witness of the Truth. He could say that Moses said so and so, but I say unto you. He had wonderful authority in His teaching. He was the Truth.

2. He was Wonderful in His Understanding

He understood the children. He understood the young. He understood the religious leader. He understood the political ruler. He understood the rich young man. He also understood the poor widow. He knew all men and knew very well what was in man (John 2:24,25). He was wonderful in His understanding.

3. He was Wonderful in His Rebuke

He rebuked the religious authorities for their hypocrisy and removed the mask off their faces. He clearly distinguished between the wrong and the right, between the false and the true. He never compromised in principle. He was the true Counselor because He knew when to use His rod of correction.

4. He was Wonderful in His Guidance

He called and chose His disciples and guided them in their training. He showed people the way that they needed to go. He was the Way. He was the Light of the world.

“For unto us a Child is born, unto us a Son is given” (Isaiah 9:6)

The prophetic text leaves no room for confusion; the child is born, but the Son is given. Jesus is not Mary’s son; He is her child: Jesus is the Son of God. The “Son is given” speaks of the divinity of Christ.

The Hebrew word used for “given” is nathan and carries the idea of purposeful giving. The Son is given in accordance to a plan, an appointment, and a purpose.

1. The Giving of the Son was Foreordained.
2. The Giving of the Son was a Sacrifice.
3. The Giving of the Son was Eternal.

1. The Giving of the Son was Foreordained

The Bible calls Jesus “the Lamb slain from the foundation of the world” (Rev.13:8), who “was foreordained before the foundation of the world, but was manifest in these last times” for us (1 Pet.1:20). It was by Jesus and for Jesus that the world was created (Col.1:16); therefore, the universe and its Lord already belonged to each other. Human sin brought separation from the Lord, and He fulfilled His role of the Redeemer by giving Himself up to save His people. To God who is omniscient, the giving of the Son was not an emergency plan but foreordained according to His foreknowledge (Acts 2:23).

2. The Giving of the Son was a Sacrifice

The giving of the Son was a sacrificial gift to the world. It was the Great Sacrifice. The sacrifices of animals could not save man. No human could atone for any other human. So, God became flesh to pay the price of our redemption. Therefore, declared Jesus:

Sacrifice and offering thou wouldest not, but a body hast thou prepared me: In burnt offerings and sacrifices for sin thou hast had no pleasure. Then said I, Lo, I come (in the volume of the book it is written of me,) to do thy will, O God. (Hebrews 10:5-7)

3. The Giving of the Son was Eternal

The Incarnation of God the Son was not temporary. It was eternal. Jesus became one of us forever, so that He could redeem us for God forever. The truth and virtue of the Incarnation are absolute and unchangeable. Therefore, “he who has the Son has life” (1Jn.5:12).

हमें एक पुत्र दिया गया है (यशायह 9:16)

वह बालक के रूप में पैदा हुआ परन्‍तु पुत्र के रूप में दिया गया। यीशु मरियम का पुत्र नही पर बालक ही था। वह परमेश्‍वर का पुत्र था। ‘दिया गया’ शब्‍द उसके ईश्‍वरत्‍व को दर्शाते है।

इब्रानी शब्‍द नाथान जो दिया गया के लिए उपयोग किया गया, वह उददेश्‍यपूर्ण दान को दर्शाता है। पुत्र योजना, उददेश्‍य एवं नियुक्तिनानुसार दिया गया।

1 पुत्र का दिया जाना पूर्वनिर्धारित था
2 पुत्र का दिया जाना एक बलिदान था
3 पुत्र का दिया जाना अनंत है

1 पुत्र का दिया जाना पूर्वनिर्धारित था

यह वह मेमना था जो संसार के नीव डाले जाने से पहले वध किया गया (प्रकाश 13:8), जिसे युग के प्रारंभ से ही ठ‍हराया गया था परन्‍तु अंत के दिनों में प्रगट किया गया (1पत 1:20)। यीशु के द्वारा और उसके लिए जगत रची गई (कुलु 1:16)। सो आरंभ ही से यह प्रभु का और वह इसका प्रभु ही है। मनुष्‍य के पाप ने हमें परमेश्‍वर से अलग कर दिया। और उसने हमारे उद्धारकर्ता के रूप में अपने आप को हमारी मुक्ति के लिए दे दिया। परमेश्‍वर तो सर्वज्ञानी है इसलिए यह पूर्वनिर्धारण उसके पूर्वज्ञान के अनुसार ही था।

2 पुत्र का दिया जाना एक बलिदान था

यह तौफा जगत के लिए परमेश्‍वर का सब से बडा बलिदान था। पशुओं के बलिदान से मुक्ति असंभव था। कोई मानव दूसरे को बचाने का योग्‍य नही था। इसलिए परमेश्‍वर शरीर में प्रगट हुआ ताकि हमारे लिए प्रायश्चित का बलिदान बने। इसलिए यीशु ने कहा:

बलिदान और भेंट तू ने न चाही, पर मेरे लिए एक देह तैयार किया।
होम-बलियोंऔर पाप-बलियों से तू प्रसन्न नहीं हुआ।
तब मैं ने कहा, देख, मैं आ गया हूं, (पवित्र शस्‍त्र में मेरे विषय में लिखा हुआ है) ताकि हे परमेश्वर तेरी इच्‍छा पूरी करूं।
(इब्रा 10:5-7)

3 पुत्र का दिया जाना अनंत है

देहधारण अस्‍थायी नही परंतु अनंत है। वह हमेशा के लिए हम में से एक बन गया ताकि परमेश्‍वर के लिए हमें वह अनंतकाल के लिए छुडा लें। देहधारण का तथ्‍य एवं प्रभाव अनंत और निरपेक्ष है। इसलिए जिसके पास पुत्र है उसके पास जीवन है। (इब्रा 10:5-7)

क्योंकि हमारे लिये एक बालक उत्पन्न हुआ, हमें एक पुत्र दिया गया है, और प्रभुता उसके कांधे पर होगी, और उसका नाम अद्‌भुत युक्ति करनेवाला पराक्रमी परमेश्वर, अनन्तकाल का पिता, और शान्ति का राजकुमार रखा जाएगा। (यशायह 9:6)

रबिन्‍द्रनाथ टागोर ने एक बार कहा की हर एक बच्‍चा जो दुनिया में आता है वह यह संदेश के सा‍थ आता है कि परमेश्‍वर अब भी मनुष्‍य के साथ निरुत्‍साहित नही है। शिशु मानवता के लिए आशा का एक चिन्‍ह है। यदी परमेश्‍वर किसी निर्दोष एवं असहाय बच्‍चे को इस पापमय और हिंसात्‍मक जगत में भेज देता है तो इस का मतलब यह है कि जगत के लिए अब भी आशा है। परमेश्‍वर इतिहास पर नियंत्रण रखता है।प्रथम क्रिसमस की रात्री पर कुछ 2015 वर्ष पूर्व, एक विशेष बालक बेतलहेम नामक एक छोटी सी नगरी में पैदा हुआ। उसी रात इतिहास का सब से बडा क्रिसमस कोयर आसमान में प्रगट होकर कुछ गरीब चरवाहों के सामने एक कैरल को गाया:
आकाश में परमेश्वर की महिमा और पृय्‍वी पर उन मनुष्यों में जिनसे वह प्रसन्न है शान्‍ति हो।।

इस गीत से पहले एक स्‍वर्गदूत ने उनसे कहा था:

तब स्‍वर्गदूत ने उन से कहा, मत डरो। क्‍योंकि देखो मैं तुम्हें बड़े आनन्‍द का सुसमाचार सुनाता हूं जो सब लोगों के लिये होगा। कि आज दाऊद के नगर में तुम्हारे लिये एक उद्धारकर्ता जन्‍मा है, और यही मसीह प्रभु है। और इस का तुम्हारे लिये यह पता है, कि तुम एक बालक को कपडे मे लिपटा हुआ और चरनी में पड़ा पाओगे। (लूका 2:10-13)

कपडे मे लिपटा हुआ और चरनी में पड़ा वह बालक चरवाहों के लिए एक चिन्‍ह था। आज वह हमारे लिये भी चिन्‍ह है।

1. कपडे मे लिपटा

कपडे मे लिपटा, स्रोत: विकिपीडिया

जब उसका जन्‍म हुआ तो उसके माता-पिता ने उसे कपडे मे वैसा ही लपेटा जैसे अन्‍य किसी भी बच्‍चे को उन दिनों में किया करते थे। कपडे मे लपेटने से बच्‍चा सुरक्षित, शान्‍त एवं आराम महसूस क‍रता था। वह हम में से एक बन गया। हमारे जन्‍म, हमारे शिशुवत्‍व, एवं हमारे असहायता में वह हम में से एक बन गया।

कपडे मे लपेटने की प्रथा सदियों से चले आ रही है और इस का उददेश्‍य बच्‍चे को गरम और कसा हुआ रखने का था। यह शिशु के अचानक मृत्‍यु से उसे बचाती थी। डॉ हारवे कार्प के अनुसार कपडे में लपेटने से बच्‍चे को स्‍पर्ष प्राप्‍त होता है, चादर को लात मारके फेंकने या खींचने से वह उसे बचाता था, और वह बच्‍चे का ध्‍यान को केंद्रित रखता था। शायद यीशु का मनुष्‍यत्‍व को मरियम से अधिक करीबी से कोई ने नही देखा। जो कुछ एक बच्‍चे के लिए करना था उस के लिए किया गया। वह हम में से एक हो गया। बुद्धिमानों के लिए तो तारा चिन्‍ह बना पर चरवाहों के लिए कपडे मे लिपटा हुआ और चरनी में पड़ा वह बालक ही चिन्‍ह बन गया।

2. चरणी

चरणी पशुओं के चरणे का पात्र था. युनानी शब्‍द फाटने का उपयोग हालांकि लूका 13:15 में यान के लिए उपयोग किया गया फिर भी यहा चरणी के लिए उपयोग किया गया है। शायद यूसूफ ओर मरियम अपने पूर्वजीय घर में आए हुए थे परंतु अलग कोई कमरा नही होने के कारण प्रसव के समय मरिया को गोशाले में लाया गया जहा उसने यीशु को जन्‍म दिया और उसे चरणी में रख दिया। शायद इसी घर में ही वे बाद में कुछ और दिन रुके हुए थे। जो भी हो, एक बात तो सिद्ध है कि परमेश्‍वर ने खोए हुए संसार के उद्धार के लिए अपने पुत्र को एक गृहरहित अवस्‍था में भेज दिया। यही गृहरहित बालक एक दिन चलकर जगत को स्‍वर्ग का मार्ग दिखाएगा। जिसे सराय में स्‍थान नही मिला था उसने क्रूस पर अपना वह स्‍थान पाया जहा उसने जगत का परमेश्‍वर के साथ मेल कर दिया।

For unto us a Child is born, unto us a Son is given; and the government will be upon His shoulder. and His name will be called Wonderful, Counselor, Mighty God, Everlasting Father, Prince of Peace. (Isaiah 9:6)

Rabindranath Tagore once said, “Every child that is born into this world comes with a message that God is not yet disappointed with man.” A child is a symbol of hope for humanity. If God can send an innocent, dependent, and vulnerable little babe into this world of sin and violence, it means that there is still hope for humanity. God is in control of history.

On the first Christmas night, some 2015 years ago, a special child was born in a town called Bethlehem. That same night, the biggest Christmas Choir of all ages assembled in heaven and sang a carol to a few poor shepherds watching their flock by night. They sang only two lines:

“Glory to God in the highest,
And on earth peace, goodwill toward men!”

But before they sang it, an angel had announced:

“Do not be afraid, for behold, I bring you good tidings of great joy which will be to all people. For there is born to you this day in the city of David a Savior, who is Christ the Lord. And this will be the sign to you: You will find a Babe wrapped in swaddling cloths, lying in a manger.” (Luke 2:10-13)

A Babe wrapped in swaddling cloths, lying in a manger, was the sign that the shepherds were given. This is also the sign given to us after over two millennia.

1. A Wrapper of Swaddling Cloths

Swaddled Infant, Source: Wikipedia

If you have opened the wrapper of a Christmas gift today, and even if you didn’t have one to open, think of the Real Christmas Gift that God gave to this world. When He was born, His parents wrapped Him up in swaddling cloths, as any parent would have done to their child in those days. Swaddling made the child feel comfortable, calm, secure and restful. He became one of us. He became one of us in our conception. He became one of us in our birth. He also became one of us in our infancy. He became one of us in our most vulnerable and helpless state.

Wrapping children in swaddling cloths was an ancient practice of keeping the child both warm and tight. It was supposed to make a child feel comfortable, secure, and protected him from Sudden Infant Death Syndrome (SIDS). American Pediatrician, Dr. Harvey Karp, in his book The Happiest Baby in the Block, wrote “Swaddling is the cornerstone of calming. It gives nurturing touch, stops flailing, and focuses your baby’s attention.” The swaddling cloths prevented the child from movement of limbs. Thus, it protected him from accidentally kicking the blanket away or pulling it over his face. Tightly wrapped in the swaddling cloths, the child was restful and secure. One wonders if anyone more closely saw the humanity of Jesus than His mother, Mary. Imagine everything that a mother would do for her child was done for Jesus. He had truly become one of us. The sign given to the Magi was a Star. The sign given to the shepherds was a Babe wrapped in swaddling cloths.

2. A Bed of Hay

A manger was a feeding trough for animals. While the Greek word phatne is translated as “stall” in Luke 13:15, it may have been translated as “manger” here, since the syntax suggests that meaning. Mary and Joseph didn’t find a room in the inn (or perhaps guest chamber of their ancestral home. This ancestral home may also have been the place where they stayed for many days after the birth). It is more probable that the house was full of guests already and Mary might have been shifted to the stable when the time of delivery had come; and so, she brought forth the child, wrapped Him in swaddling clothes, and placed Him in a manger nearby. And, there He lay as God’s sign of answering the lost condition of humanity through the homeless condition of the Child who was destined to show to the world the way to heaven. Years later, the One who didn’t find a place in an inn would find place on the Cross, and there reconcile the world to God.

सृष्टि माइचलांजलो द्वारा. स्रोत: विकिपीडिया

एक नास्तिक के बारे में बताया जाता है की एक बार वह रेगिस्तान में किसी अरबी के साथ यात्रा कर रह था। कहा जाता है कि एक सुबह वह उठा और देखा कि अरबी दुआ कर रहा है। उसने उससे पूछा कि वह क्या कर रहा है, तो अरबी ने कहा कि वह ईश्वर से प्रार्थना कर रहा है। नास्तिक ने पूछा की क्या परमेश्वर के अस्तित्व का उसके पास कोई प्रमाण है, तो अरबी ने वापस पूछा कि क्या वह रेत पर के पद्चिन्हों को पह्चान सकता है। उसने कहा क्यूं नही, ये तो ऊंट के पद्चिन्ह है। अरबी ने कहा जब मै आसमान में सूर्य, चन्द्रमा एवम तारों को देखता हूं तो वे मेरे लिये परमेश्वर के पद्चिन्ह के समान ही है।

बाईबल हमे बताती है कि स्वर्ग परमेश्वर की महिमा और आकाश उसके हस्तकला का वर्णन कर्ती है (भजन 19:1)। हमने यह देखा है कि सृष्टि परमेश्‍वर के अनंत सामर्थ एवं ईश्‍वरत्‍व का वर्णन करती है (रोमियों 1:20)। और उसके ईश्‍वरत्‍व को सृष्टि या उसके वस्‍तुओं के साथ तुलना नही किेया जा सकता है। परमेश्‍वर संसार से परा एवं भिनन है।

बाईबल का शुरुआती वाक्‍य परमेश्‍वर को सृष्टिकर्ता के रूप में प्रगट करता है। आदी में परमेश्‍वर ने आकाश और पृथ्‍वी की रचना की। बाईबल परमेश्‍वर के अस्तित्‍व को सिद्ध करने की कोशीश नही करती। परमेश्‍वर का सृष्टिकर्ता के रूप में पहचान विश्‍व के किसी भी आदिम धर्म में पाया जा सकता है। मानवविज्ञान इस बात को प्रमाणित कर देती है कि आदि धर्म एकेश्‍वरवादी था और प्रेतवाद एवं बहुऐश्‍वरवाद बाद में आए है।

सृष्टिकर्ता की उपाधि केवल परमेश्‍वर का ही हो सकता है क्‍योंकि केवल वह सत्‍य रूप में जगत का स्रोत है। उसने किेसी वस्‍तु से नही परन्‍तु शून्‍य से जगत का निर्माण किया है। हर दूसरी मानव रचना परमेश्‍वर के आदी विचार पर आधारित है। चाहे वह चित्रकार के रंगे हो या संगीतकार के धुन, वे सब जगत निर्माता की रचना पर ही आधारित कलाएं है। यहा तक की वैज्ञानिक भी उसके प्रकृति के लिए ठहराए नियमों से अलग कुछ नही कर सकता।

बाईबल सृष्टिकर्ता के विषय में कम से कम तीन बातों को प्रगट करती है।
1. उसका असीमित सामर्थ
2. उसका बुद्धिमत उददेश्‍य
3. उसका निरन्‍तर पालन

1. उसका असीमित सामर्थ

उसने अपनी असीमित सामर्थ से जगत को बनाया। एक किलो के वजन को एक सेकण्‍ड में एक मीटर दूर ढकेलने के लिए एक इकाई बल की आवश्‍यकता है। शून्‍य से जगत का निर्माण तो असीमित बल से ही हो सक्‍ता है। यह बल जगत में निहित नही अन्‍यथा जगत ह्रास के ओर अग्रसर नही होता। परमेश्‍वर ने जगत को अस्तित्‍व में लाया।

2. उसका बुद्धिमत उददेश्‍य

वह सर्वज्ञानी है और जगत का निर्माण बुद्धि से उसने किया। मानव शरीर का एक कोशिका विश्‍व के किसी भी सूपर कम्‍प्‍यूटर से अधिक जटिल है। डीएनए के बिना जीवन भी असम्‍भव है। परमेश्‍वर ही ने हर वायु, थल, एवं जल जीव का निर्माण किया है। इस रचना पर शोध कई शताब्दियों तक पूरा नही हो सकता। ये सब रचनाकार के विषय में बयान देती है।

3. उसका निरन्‍तर पालन

न केवल वह जगत का निर्माता है बल्कि वह उसका पालनहारा भी है। उसने उसे बनाकर यूं ही नही छोड दिया। वह जगत में सक्रिय है। उसमें सब कुछ स्थिर है (कुलुसियों 1:17), वह अपने सामर्थ के वचन से सब कुछ सम्‍भालता है (इब्र 1:3) और उसी में हम सब जीवित रहते है और अपना अस्तित्‍व पाते है। जैसा लिखा भी गया है कि उस ने अपने आप को बे-गवाह न छोड़ा? किन्‍तु वह भलाई करता रहा, और आकाश से वर्षा और फलवन्‍त ऋतु देकर, हमारे मन को भोजन और आनन्‍द से भरता रहा। (प्रेरित 14:17)

‘’उसी ने पृथ्‍वी को अपने सामर्थ से बनाया, और जगत को अपनी बुद्वि से स्थिर किया? और आकाश को अपनी प्रवीणता से तान दिया है।‘’ (यर्म 51:15)

Creation by Michelangelo. Source: Wikipedia

A story is told of an atheist who was cruising the desert with a pious Arab. Early one morning, it is said, the atheist got out of his tent to find the Arab on his knees muttering a prayer. He curiously inquired what he was doing, to which the Arab replied that he was praying to God. The atheist remarked with an air of intellectual pride, “On what grounds do you believe there is a God, my friend.” The Arab was silent and then replied, “Do you see those footprints on the sand? Whose do you think they are?” “A camel’s, for sure,” the atheist answered. “Of course, those prints as they are couldn’t just haphazardly happen. In the same way, when I look at the sun, the moon, and the stars, I understand that they couldn’t just haphazardly happen either. They are the footprints of God on the sky.”

The Bible tells us that the heavens declare the glory of God and the firmament shows His handiwork (Psalm 19:1). We have noted in “Who is God” that God’s eternal power and Godhead is revealed through the things He has made (Romans 1:20). We have also seen that the Godhead must neither be confused with the things nor the forms of the world. God is the distinct other, transcendent and above the world He has made.

The Bible opens with God as the Creator of the world. “In the beginning,” it says “God created the heavens and the earth.” The Bible doesn’t attempt to prove the existence of God and His role as the Creator of the world. Modern anthropological research has proved that belief in the Creator God is not a latter development but present in the original world-view of almost every tribal religion in the world. It is not as the evolutionary model theorizes that monotheism evolved out of animism, spiritism, and polytheism. There was, in fact, a devolution rather than an evolution (See Lion Handbook, The World’s Religions, (Oxford, 1992), pp. 28-32).

The title “Creator” can only be truly applied to God, since He alone has originated everything else. He didn’t use a pre-existing pattern or substance to create the world. He created it out of nothing. Every other human production is based on God’s original idea. The fashion designer looks at the patterns in nature to tone his colors. The musician listens to the rhythm of nature to tune his notes.  The inventor draws his laws of invention by observing the uniform texture of nature. They are all based on the single original that the Grand Weaver has spread out for mortal eyes to behold in wonder.

The Bible reveals at least three things about God as the Creator:

1. His Infinite Power
2. His Intelligent Purpose
3. His Incessant Providence

1. His Infinite Power.

God is an omnipotent, all powerful, God. It is only by His infinite power that He brought this world out of nothing into existence. It takes one unit force to move one kilogram of mass at one meter per second per second. It takes infinite force to bring out anything out of absolute nothing. This power is not inherent in the universe as the laws of thermodynamics tell us. If the universe had infinite power in it, then the universe would never run out. However, if it is running down, it must have had a beginning point as well. Therefore, it is even more rational to believe that the world was created by God’s infinite power than to try to theorize that the finite universe is originally infinite.

2. His Intelligent Purpose.

God is an omniscient, all knowing God. He is an intelligent and wise designer. He established the world by His wisdom. It is said that a small cell in the human body is more complex than the greatest of super computers ever invented. Biologists know that the DNA code must precede the development of life and life itself cannot produce the DNA. God laid the blueprint of the world: the birds, the insects, the fish, the whales, all animals, and man. Eons of research and study will not be able to exhaust the amount of intelligence that stands out as evidence for a world that could only be created by a personal and intelligent God.

3. His Incessant Providence.

Not only has God created the world, but He also sustains it. God didn’t create and then abandoned the universe; He created it and is incessantly at work in it. Colossians 1:17 says that in Him do all things consist; Hebrews 1:3 says that He upholds all things by the word of His power; and Acts 17:28 says that in Him we live and move and have our being. The Bible tells us that God has not left Himself without testimony: He has shown kindness by giving us rain from heaven and crops in their seasons; He provides us with plenty of food and fills our hearts with joy” (Acts 14:17).

“He has made the earth by His power; He has established the world by His wisdom, and stretched out the heaven by His understanding.” (Jeremiah 51:15)