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Archive for November, 2011

“God is like the sun;” said the English writer G.K.Chesterton, “you cannot look at it, but without it, you cannot look at anything else.” The Bible refers to Him as the King eternal, immortal, invisible, God who alone is wise (1Tim.1:17). John 1:18 tells us that nobody has seen God at anytime. However, though He is the invisible one and nobody has ever seen Him, God is the most real personality man can ever know. This is so for two reasons:

1. God’s invisible attributes are clearly seen and understood by the things He has made (Rom 1:20).

2. In Him we live and move and have our being; so, that though we might be away from everybody in the universe, it is impossible to be away from God – “He is not far from each one of us” (Acts 17:27-28, NKJV). He is closer to us than the breath that we breathe.

God’s Eternal Power

St. Anselm described God as that than which a greater cannot be conceived or thought of. God is the greatest being anyone can ever know. He is the ultimate BIG ONE. He is where knowledge comes to an end and imagination falls prostrate in worship.

This means that God is Infinite. He is infinite in being and power. He is omnipotent (all-powerful), omniscient (all-knowing), and omnipresent (all-present). He transcends both space and time through His immense infinity. He is the Eternal God. Now, it is intriguing that man has a concept of infinity and eternity but is not able to comprehend it. The reason is explained in the Bible. Ecclesiastes 3:11 says that God has set eternity in the hearts of humans, yet they cannot fathom what God has done from beginning to end.

We cannot comprehend the infinite nature of God. There is a story told of St. Augustine that once he was strolling along the beach of an ocean, musing within himself about a book he was writing on God. Suddenly, he saw a child working on the beach and stopped by to see what he was doing. The child had dug a little hole on the beach and was running to and fro fetching water from the ocean and filling it into the hole with a small scoopy shell. Augustine enquired, “What are you doing, child?” and the child answered, “I’m trying to empty the ocean into this hole.” Augustine could not stop laughing, and said “The ocean is too vast, child, and your hole too small for it to be able to contain the waters of the ocean,” to which the child abruptly remarked, “That’s fine, I should be able to sure empty the ocean into my hole before you’re able to fully comprehend God with your mind,” and then he vanished. Augustine realized that he was attempting the impossible. We can never be able to fully comprehend God with our finite minds. However, the Bible does teach us that whatever should be known about Him is already revealed to us.

God’s Nature (Godhead or Divinity)

The Bible makes it clear that God is a Being whose nature differs from the nature of His creation. He is God by nature, and the world is world by nature. The divine nature is called Godhead in the same way that human nature is referred to as humanhood. Humanhood distinguishes humans from cats (which possess cathood); similarly, Godhead distinguishes God from the world.

There are especially two things that the Bible teaches us regarding the Godhead.

1. The Godhead is not to be confused with the world (Rom. 1:23).

Though God is immanent (present) in the world, He truly transcendent and separate from it. The glory of the incorruptible God must not be confused with the image of corruptible man, and birds, and four-footed animals and creeping things. The world is not divine. This distinction is logically present in the use of the name “God”. To call the world God, as in Pantheism or in even Monism, would be to confuse terminological usage. It would be like calling a Carpentar a piece of furniture. God is not only One (there is no other God except the One True God, as there can be no other Infinite); He is also Distinct.

2. The Godhead is not to be represented by the things of the world (Acts 17:29).

God is Spirit. He is a person who knows, feels, wills, and speaks. He is not wood, stone, silver, or clay. Idolatry confuses, distorts, misrepresents, and limits the being and personality of God. So, the Bible prohibits idolatry of any kind. The knowledge of God can never be a human invention; it is only what has been revealed to us.

Thus, we know that the Godhead consists of Unity (Oneness of God), Transcendence (Different from the World), Spirituality, Personality, and Eternity.

But, the most important truth of all is that God has revealed Himself to us and we know Him as the One above whom there can be no other.

अंग्रेजी लेखक जि. के. चेस्टेर्टन ने कहाँ “परमेश्वर सूर्य के समान है; उसे हम देख नहीं सक्ते और उसके बिना हम और किसी भी चीज को देख नहीं सक्ते। बाइबल के अनुसार वह अनंत राजा, अमर, एवम अदृश्य परमेश्वर है (1तिम 1:17। यूहन्ना 1:18 के अनुसार किसी ने भी परमेश्वर को कभी भी नही देखा। लेकिन यद्यपि परमेश्वर अदृश्य है और किसी ने उसे नही देखा तौभी वह सब से अधिक वास्तविक व्यक्तित्व है। यह दो कारणो से है:

1. परमेश्वर के अदृश्य् गुण उसके बनाये हुए चीजो के द्वारा स्पष्ट रूप से दिखाए देता है (रोम 1:20)।
2. हम उसी में जीवित रहते, और चलते-फिरते, और स्थिर रहते हैं; इस कारण से यद्यपि हम सभो से दूर हो जाए पर परमेश्‍वर से दूर नही जा सकते।  वह हम में से किसी से दूर नहीं। (प्रेरित 17:27-28)वह हमारे स्वास से भी अधिक हमारे करीब रहता है।

परमेश्वर का अनंत सामर्थ

संत अंसल्म ने परमेश्वर के विषय मे कहा है की परमेश्वर वह है जिस से महान की कल्‍पना नही किया जा सकता। परमेश्‍वर सब से महान है। उस में आकर सारा ज्ञान का अंत हो जाता है और सारी कल्‍पना आराधना में दण्‍डमस्‍तक हो जाती है।

इसका मतलब यह है कि परमेश्‍वर असीमित है। वह सत्‍ता एवं सामर्थ में असीमित है। वह सर्वसामर्थी, सर्वज्ञानी, एवं सर्वोपस्थित है। वह काल एवं आकाश पर अपने विराट अनंतता के द्वारा से अपार है। अब यह अचरज की बात है कि मनुष्‍य के पास उसकी अनंतता एवं असीमितता का विचार है परन्‍तु समझ नही। कारण बाईबल के सभोपदेशक 3:11 में दिया गया है जहा बताया गया है कि परमेश्‍वर ने मनुष्‍यों के हृदयों में अनंतता रखा है, तौभी वे उसके कार्य को प्रारंभ से अंत तक नही समझ सकते।


हम परमेश्‍वर के अनंत स्‍वभाव को समझ नही सकते है। संत अगस्तिन के बारे में कहा जाता है कि एक दिन जब ईश्‍वर के बारे में जो पुस्‍तक लिख रहे थे उस पर मनन करते हुए जब वे समुद्र के तट पर चल रहे थे तो उनहोने एक बच्‍चे को समुद्र से एक छोटे से गडहे में पानी लाकर भरते हुए देखा। अगस्तिन ने उससे पूछा कि बेटे तुम क्‍या कर रहे हो, जिसके जवाब में बच्‍चे ने कह दिया कि वह समुद्र को अपने गडहे में खाली करने का प्रयत्‍न कर रहा है। अगस्तिन ने हस कर कह दिया किे यह तो असम्‍भव है क्‍योंकि समुद्र उसके छोटे से गडहे से बहुत बडा है। बच्‍चे ने झट उत्‍तर दिया, आपके इस सीमित बुद्धि से परमेश्‍वर को सम्‍पूर्ण रीती से समझ लेने से पहले तो मै यह काम कर ही लूंगा। यह कहकर वह अदृश्‍य हो गया। हम परमेश्‍वर को पूरे रीती से समझ तो नही सकते है परन्‍तु उसके विषय में जो कुछ हमें आवश्‍यक है वह ज्ञान उसने हम पर प्रगट कर दिया है।

ईश्‍वरीय स्‍वभाव या ईश्‍वरत्‍व

बाईबल स्‍पष्‍ट रीती से बताता है कि परमेश्‍वर का सत्‍ता सृष्टि से भिन्‍न है। वह स्‍वभाव से ईश्‍वर है और जगत स्‍वभाव ही से जगत है। र्इश्‍वरत्‍व ईश्‍वर को जगत से अलग करता है।

ईश्‍वरत्‍व के विषय में दो बातों को जानना आवश्‍यक है:


1. वह जगत और उसकी वस्‍तुओं से अलग है। (रोम. 1:23)वह जगत में उपस्थित है परन्‍तु उससे भिन्‍न है। परमेश्वर की महिमा को नाशमान मनुष्य, और पक्षियों, और चौपायों, और रेंगनेवाले जन्‍तुओं की मूरत की समानता में बदला नही जा सकता. जगत परमेश्‍वर नही है. यह पृथकता तो ईश्‍वर शब्‍द के उपयोग ही में निहित है. जगत को ईश्‍वर कहने का अर्थ कुर्सी को बढ़ई कहने के समान ह। न केवल परमेश्‍वर अद्वैत है (बहु अनंतों का होना असंभव है), वह भिन्‍न भी है।


2. परमेश्‍वर को जगत की किसी भी वस्‍तु के द्वारा दर्शाया नही जा सकता(प्रेरित 17:29)। परमेश्‍वर आत्‍मा है। वह एक व्‍यक्तित्‍व है जिसमें ज्ञान, विचार, भावना, एवं नैतिक निर्णय वर्तमान है। मूर्तिवाद इस व्‍यक्तित्‍व की नसमझ, गलत बयान, एवं अपमान है. इसलिए बाईबल मूर्तिवाद के विरुद्ध है। दैवीय ज्ञान मानवी सृजन नही परन्‍तु परमेश्‍वर के प्रकाशन से प्राप्‍त होता है।


सो हम यह जान जाते है कि ईश्‍वरत्‍व में अद्वैतता, भिन्‍नता, आत्मिकता, व्‍यक्तित्‍व, एवं अनंतता है।


लेकिन सब महत्‍वपुर्ण तथ्‍य तो यह है कि परमेश्‍वर ने अपने आप को हम पर प्रगट किया है और हमें यह मालूम है कि वह परम है और उससे बढ़कर कोई नही।